वर्षीतप पारणा स्पेशल
✍🏻हम सब वर्षीतप के बारे में जानते है पर काफी लोग यह नही जानते के वर्षीतप पारणा इक्षु रस से ही क्यों?
वर्षीतप पारणा में
इक्षु-रस ही क्यों ?
भगवान श्रेयांस कुमार के द्वार परक आये वहां उसके अपने कार्य हेतु इक्षु-रस उपलब्ध था। उसने निर्दोष और सहज उपलब्ध इक्षु-रस का आग्रह कर लेना उचित समझ कर भाव-भक्ति पूर्वक निवेदन किया और प्रभु ने कर-पात्र आगे कर दिया।
एक वर्ष से भी अधिक दिनों से निराहार थे अत: इक्षु-रस यथेष्ठ रूप में ग्रहण कर अपना पारणा किया।
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अन्य वस्तु छोड़ मात्र इक्षु-रस ही क्यों ग्रहण किया ?
इस प्रश्न का उत्तर इक्षु-रस में प्रकृति वश सहज मीठास और उसकी गुणवत्ता में निहित है।
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इक्षु-रस शक्ति प्रद, क्षुधा रोधी और सहज माधुर्य लिए एक स्वादिष्ट पेय है, जिसमें कहीं भी कोई कृत्रिमता नहीं है। इक्षु-रस का चिकित्सीय विश्लेषण करें तो यह कई तरह से स्वास्थ्य के लिए हितावह सिद्ध होगा। अनेक शारीरिक व्याधियों का उपचार इक्षु-रस के माध्यम से भी होता है। समस्त विकृतियों से मुक्त इक्षु-रस एक प्राकृतिक पेय है, उसकी सात्विकता का महत्व देकर प्रभु ने इसे ग्रहण किया।
इक्षु-रस में जो प्राकृतिक सरसता है वह तो निश्चय ही बेजोड़ है।
भारतीय संस्कृति में इक्षु दंड को अति मंगल मय माना जाता है यही कारण है कि दीपमालिका और अन्य उत्सवों के अवसर पर इक्षु-दंड स्थापित किये जाते हैं।
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लोक मंगल का प्रतीक इक्षु उसके रस से विश्व मंगल के प्रणेता परमात्मा भगवान ऋषभ देव ने पारणा किया।
सुदीर्घ तपश्चर्या के कारण कोष्ठ का संकुचन स्वाभाविक है। उस स्थिति में सम शीतोष्ण इक्षु-रस ही पारणे के लिए सर्वथा उचित रहता है। जिससे कोष्ठ पुन: क्रमश: विकसित होकर कार्य करने लग जाये।
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यही कारण है कि आज भी वर्षी-तप के तपस्वी इक्षु-रस से ही पारणा करते हैं। कितनी ही सुदीर्घ तपश्चर्या क्यों न हो यदि इक्षु-रस को अल्प मात्रा में लेकर पारणा किया जाये तो वह पारणा अवश्य सफल होगा।
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*प्रभु आदिनाथ पारणा गीत🙏🏻
पारणीया ने काज पधारो
ओ देवाधिदेवा
विनवे झुरे झंखे लोको
प्रभु स्वीकारो सेवा
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