श्री आदेश्र्वर दादा - सेठ श्री मोतीशा टुंक पालीताणा
शेठ मोतीशा की टुंक - मोतीवसी
श्री शत्रुंजय पर अब तक निर्मित टुकों में सबसे बड़ी टुंक मुंबई के मोतीशा शेठ की है। इस मोतीशा शेठ की टुंक का निर्माण नही हुआ था तब उस जगह पर बड़ी कुंतासर की खायी थी उसको देखते ही चक्कर आ जाये इतनी बड़ी लंबी और गहरी खायी को पूरा भरकर यह टूंक का निर्माण करवाया गया था ।
मुंबई के धनाढ्य वेपारी शेठ मोतीशा ने एक निमित्त पाकर श्री शत्रुंजय पर टुंक बंधावाने की इच्छा हुई थी। परन्तु गिरिराज पर टुंक बंधवाने के लिए विशाल जगह नही मिल रही थी। तब उनको यह कुंतासर नाम की खायी को भर कर उस पर टुंक बंधवाने का विचार आया। यह जो खाई है अगर इसे पुरी तरह से भर दिया जाएँ और टुंक का निर्माण हो जाएँ तो यात्रियों बार बार घुम के दादा के दरबार में जाना पडता था वो सभी सीधे जा पायेंगे । परंतु दो पहाडो की बीच की खायी को भरने का काम आसान नही था।इस कार्य मे लाखो करोडो की लागत थी । साहसिक और जैन धर्म की निष्ठा रखने वाले शेठ मोतीशा ने खायी को भरवाने का निर्णय किया। लाखो करोडो के खर्चे से खायी को भरकर उस जगह पर टुंक की रचना करने के लिए निव रखी ।
१६ बड़े मंदिरो और १२३ देरीओ से सुशोभित आंखो मे यादगार रह जाएँ व ह्रदय को उज्जवळ करती यह टूंक का खर्च लाखो और करोडो मे हिसाब हुआ था , वर्तमान समय मे बाँधनी पडे तो ख़र्च का आँकड़े लिखना भी मुश्किल लगे । ऐसा कहा जाता है कि यह टूंक बनाने में जो रस्सो का उपयोग हुआ था , उसका खर्च ही लाखो मे हुआ था।
भव्य रंगमंडप और विशाळ पटांगण में बनाई "मोतीवसही" के पीछे शेठ मोतीशा का उत्साह, धर्म, भावना, धर्मप्रत्ये की गहरी श्रध्धा और विशाळ द्रष्टि है। यह टूंक बांधवाने की शुभ शरूआत मोतीशाह शेठे की थी परन्तु टुंक के संपूर्ण निर्माण और प्रतिष्ठा के पहेले ही उनका स्वर्गवास हो गया था। उनके पुत्र श्री खीमचंदभाई ने वि. स. १८९३ में भव्य प्रतिष्ठा करवायी । यह मंदिर का बाहरी दिखाव नलिनी गुल्म विमान जैसा है। इस टुंक में दर्शन करके दादा की टुंक में जा सकते है।
इस टुंक में २७२२ आरस की प्रतिमा है। १४३ धातु की प्रतिमा और १४५७ पगलियो की जोड है। अलौकिकता को साकार करती नलिनी गुल्म विमान के आकार जैसी यह टूंक की रचना पूरी होते – ७ वर्ष लग गये। ३ हजार मजूरो ने रात-दिन काम किया था।
प्राण प्रतिष्ठा से पहले ही मोतीशा शेठ बीमार हुए। और उनसे वो बच न सके । जिस काम उन्होंने शुरू किया था , वो उनके पुत्र श्री खीमचंद भाई ने पूरा किया। सवा लाख लोगो का संघ लेकर खीमचंद भाई पालीताणा पधारे। उस समय संघ में ५२ संघपति थे।
अठारा दिनो तक संपूर्ण पालीताणा मे स्वामीवात्सलय हुआ था । ऐसा कहा जाता है कि वो समय रोज के हिसाब से रसोडे का खर्च चालीश हजार का हुआ था। सं. १८९३ में दादा की प्राण प्रतिष्ठा हुई। श्री शत्रुंजयतीर्थ पर प्रतिष्ठित हजारो प्रतिमाजीओ में मोतीशा टुंक की सभी प्रतिमाओ का शिल्प और स्थापत्य की द्रष्टी से सर्वोत्तम है।
दादा के दर्शन करते शेठ मोतीशा और उनके धर्मपत्नी की मूर्ति तथा उनके मातुश्री की मूर्ति भी देरासर में पधरायी है। मुख्य देरासर के साथ जो १६ देरासरो है वो देरासर शेठ मोतीशा के मित्रो-संब्धियो -स्नेहीओ द्धारा निर्मित है।
• अमदावाद के शेठ श्री हठीसिंग केशरीसिंह ने धर्मनाथ प्रभु का देरासर
• शेठ श्री अमीचंद दमणी ने धर्मनाथ प्रभु का देरासर। वो शेठ के दीवान कहलाते थे। वो देरासर के गभारे में भीतर रत्न के दो साथीया भी लगवाये है।
• शेठ श्री प्रतापमल जोयता ने चौमुखी का देरासर। वो शेठ के मामा थे।
• दूसरा चौमुखी का देरासर धोलेरावाळा शेठश्री वीरचंद भाईचंद ने बनवाया है।
• घोघा के शेठश्री पारेख कीकाभाई फूलचंद ने आदिनाथ प्रभु का जिनालय।
• तीसरा चौमुखी का देरासर मांगरोळवाळा नानजी चीनाई ने बंधवाया है।
• अमदावाद वाळा गलालभाई का आदिनाथ प्रभु का जीनालय।
• पाटणवाळा शेठ श्री प्रेमचंद रणजीभाई ने पद्मप्रभ स्वामी का जीनालय बंधावाया है।
• सुरतवाळा शेठ श्री ताराचंद नथ्थुभाई ने पार्श्वनाथ स्वामी का जीनालय बंधवाया है।
• सुरतवाळा शेठ श्री खुशालचंद ताराचंद ने गणधर पगलो का जीनालय बंधवाया है।
• मुंबईवाळा जेठालाल नवल शाहे श्री सह्स्त्रकूट का जीनालय बंधवाया है।
• शेठ श्री करमचंद प्रेमचंद ने श्री संभवनाथ स्वामी का जीनालय बंधवाया है।
• खंभातवाळा शेठश्री पारेख स्वरूपचंद हेमचंद ने सुपार्श्वनाथ स्वामी का जीनालय बंधवाया है।
• पाटणवाळा शेठ श्री जेचंदभाई पारेख ने महावीर स्वामी का जीनालय बंधवाया है....✍
🙏 *जिन शासन ना अजवाला*🙏
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