आलंबन ध्यान :-* जिस प्रकार नीचे रहे व्यक्ति को ऊपर उठाने के लिए आलंबन की आवश्यकता रहती है, बिल्डिंग से नीचे रहे व्यक्ति लिफ्ट द्वारा ऊपर चढ़ता है, पर्वत पर सीढ़ियों के द्वारा ऊपर चढ़ता है तो कुएँ में रहा व्यक्ति रस्सी-डोरी के आलंबन से ऊपर आता है, बस इसी प्रकार ध्यान मार्ग में आगे बढ़ने के लिए भी आलंबन की आवश्यकता रहती है । वे आलंबन चार हैं-
*(1) वाचना :-* गणधर अथवा पूर्वाचार्य आदि कृत ग्रंथों का गुरु भगवंत के मुख से पाठ लेना अथवा शिष्य आदि को पाठ देना, उसे वाचना कहते हैं । वाचना से जैनदर्शन के पदार्थों का सूक्ष्म बोध है जिससे वैराग्य भाव की पुष्टि होती है ।
*(2) पृच्छना :-* जिन आगम आदि ग्रंथों का अभ्यास-स्वाध्याय आदि किया हो, उसमें कहीं शंका आदि लगे तो गीतार्थ गुरु के पास अपनी शंकाओं का योग्य समाधान करना चाहिए ।
*(3) परावर्तना :-* सूत्रों के स्थिरीकरण के लिए उन सूत्रों का पुन: पुनः परावर्तन अवश्य करना चाहिए ।
*(4) अनुचिंतन :-* मन से सूत्र-अर्थ आदि की अनुप्रेक्षा करनी चाहिए ।
*सामायिक आदि का आलंबन :-* उपर्युक्त चार आलंबनों के सिवाय सामायिक आदि छः आवश्यकों का भी आलंबन लेना चाहिए । भावपूर्वक सामायिक आदि की आराधना करने से भावोल्लास में अभिवृद्धि होती है ।
सामायिक धर्म के आचरण से जीवन में समताभाव की अभिवृद्धि होती है ।
*ध्यान का क्रम :-*
ध्यान के क्रम में यहाँ दो विभाग किये हैं-
1) केवली 2) सामान्य योगी
केवलज्ञान की प्राप्ति के बाद साधना समाप्त हो जाती है अतः उन्हें कर्मक्षय के लिए विशेष ध्यान की अपेक्षा रहती है । मोक्ष में जाने के पहले एक अंतर्मुहूर्त में केवली योगनिग्रह रूप शैलेशीकरण करते हैं । अंतर्मुहूर्त में योग का निरोध कर वे अयोगी अवस्था प्राप्त कर लेते हैं । वे सर्वप्रथम मनोयोग का, फिर वचन योग का और सूक्ष्म काययोग का निग्रह करते हैं ।
धर्मध्यान में रहे साधक आत्मा के लिए ध्यान का कोई विशेष क्रम नहीं है । अपनी स्वस्थतानुसार क्रम बना सकते हैं ।
सामान्यतः ध्यान में सर्वप्रथम मन को वश करने का होता है । मन को केन्द्रित करने के लिए वचन को नियंत्रित करना जरूरी है और उसके लिए काया की स्थिरता जरूरी है । मन के निग्रह बिना ध्यान संभव ही नहीं है ।
*क्रमशः .....
*✒ लेखक : प. पू. आचार्य श्रीमद्विजय रत्नसेसूरीश्वरजी म. सा.*
*📙 संकलन : नीतेश बोहरा, रतलाम*
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