शत्रुंजय तीर्थ का बृहत इतिहास, 10 लेख द्वारा
History of Shatranjay Giri Teerth, Palitana - taken from various Literature.
1). इस तीर्थ के उद्धार - प्रथम से अंतिम 17 वें उद्धार तक.
2). तीर्थ पर मोक्षप्राप्त सिद्ध भगवंतों की जानकारी.
3). तीर्थ की गौरवगाथा.
4). तीर्थ का महिमा वर्णन - श्री पुंडरीक स्वामीजी एवं सुधर्मास्वामीजी द्वारा । संघपति श्री भरतचक्रवर्ती से चौथे आरे के संघपतिओं का वर्णन.
5). सिद्धगिरी स्तवन - चालो सिद्धगिरीराज मले मुक्ति नी - पूण्यसम्राट श्रीमदविजय जयंतसेन सुरीश्वरजी.
6). सम्पूर्ण भावयात्रा दर्शन वर्णन.
7). श्री प्रतिमाजी वर्णन - श्री भरत महाराजा द्वारा स्थापित से वर्तमान तक.
8). तीर्थयात्रा के नियम एवं जयणा पालन.
9). श्री ऋषभदेव भगवान का इतिहास वर्णन.
10). श्री शत्रुनजयगिरी के 10 वीडियों गीत लिंक.
⛳ 🏳इस पुण्यमयी शाश्वत तीर्थ पर ५०० धनुष की काया वाले ऋषभदेव भगवान् यहां पूर्व नवाणु वार शत्रुंजयगिरी पधारें, साथ में ८४ लाख वर्ष पूर्व की उम्रवाले ८४ गणधर पधारे, ८४ हजार मुनि, ३ लाख साध्वीजी, ३ लाख ५ हजार श्रावक और ५.५४ लाख श्रविकाएँ पधारे l
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【 1 】 शत्रुंजय महातीर्थ की गौरवगाथा...
⛳ इस महातीर्थ का उद्धार ...
शत्रुंजय तीर्थ : भूत - भविष्य और वर्तमान काल के सभी तीर्थों में शिरोमणी है । अनंता-अंनत तीर्थंकरों के समय से ही यह मुख्य एवं शाश्वत तीर्थ है । देवलोक के रूचक, कुण्डल, नंदीश्वर द्वीप के तीर्थों में शत्रुंजय मुख्य तीर्थ है, अष्टापद, सम्मेत शिखरजी, पावापुरी, चम्पापुरी, अयोध्या, वाराणसी, हस्तीनापुर, गिरनार इन सभी से शाश्वत तीर्थ शत्रुंजय है l
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प्रथम् उद्धार : भगवान् ऋषभदेव पुत्र प्रथम् चक्रव्रती श्री भरत महाराजा की आज्ञा से वर्द्धकी रत्न ने मणी एवं रत्नों से युक्त त्रैलोक्य विभ्रम नाम का ऋषभदेव जिनमंदिर खड़ा कर दिया, यह विशाल जिनप्रसाद ऊंचाई में एक कोस, लम्बाई में 1.5 कोस, चौड़ाई में एक हजार धनुष जितना विशाल था, इसकी प्रतिष्ठा नाभ गणधर ने सम्पन्न करवाई l
दूसरा उद्धार : छः करोड़ वर्ष पूर्व महाराजा भरत चक्रवती के आठमी पाट के राजा श्री दण्डवीर्य ने करवाया
तीसरा उद्धार : सौ करोड़ सागरोपम के बाद श्री इशानेंद्र ने करवाया
चौथा उद्धार : एक करोड़ सागरोपम वर्ष के बाद श्री माहेन्द्र ने करवाया
पांचमा उद्धार : दस करोड़ सागरोपम के बाद पांचमे इन्द्र ने करवाया
छट्ठा उद्धार : एक लाख करोड़ सागरोपम के बाद चमरेन्द्र ने करवाया
🙌🏼 सातमा उद्धार : छट्ठे उद्धार के बाद सगर चक्रवती ने परमात्मा की मणिमय मूर्ति को पश्चिम दिशा में पधाराकर जहां सूर - अप्सरा गुफा में पूजेंगे । एवम् पाषाण के मंदिर करवाकर सातमां उद्धार किया l
आठवां उद्धार : श्री अभिन्दन स्वामीजी के समय व्यंतरेन्द्र ने करवाया
नवमां उद्धार : श्री चन्द्रयशा राजा ने करवाया
दसमां उद्धार : श्री शांतिनाथ प्रभु के पुत्र चक्रायुद्ध राजा ने करवाया
इग्यारवां उद्धार : श्री मुनिसुव्रत स्वामीजी के समय श्री रामचन्द्रजी ने करवाया
बाहरवां उद्धार : श्री नेमिनाथ प्रभु के समय पांडवों ने करवाया
तेहरवां उद्धार : वि. स्. 108 में जावडशाह ओसवाल ने करवाया
चौदहवां उद्धार : वि. स. 1213 में श्रीमाल वंश के बाहड मन्त्री ने करवाया
पन्द्रहवां उद्धार : वि. स. 1371 में समराशाह ओसवाल ने करवाया
सोलहवां उद्धार : वि. स. 1587 में कर्माशाह ने करवाया l
*अंतिम उद्धार विमलवाहन राजा दुप्पहसूरि के उपदेश से पांचवें आरे के अंत में होगा l
** छट्ठे आरे में भी यह विमलगिरी विच्छेद नही होगा, सात हाथ का रहेगा l
श्री शत्रुंजय गिरिवर स्वयं तीर्थ रूप है, दूसरे सभी तीर्थों की महिमा जीनेश्वर के कल्याणक की कारण स्वरूप है जबकि इस तीर्थराज की महिमा अनन्ता अनन्त ( करोड़ों करोड़ ) आत्माओं द्वारा इस सिद्धगिरी पर सिद्धगति को प्राप्त करने में रही हुई है l अवश्य ही इस तीर्थ की यात्रा कर आत्मकल्याण की ओर आगे बढ़ें, शुभम् अस्तु ।।
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【 2 】शत्रुंजय महातीर्थ सिद्ध भगवंतों की गौरवगाथा..भवोदधि तारक पावन महातीर्थ
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अनंतसिद्ध नो ए ठाम, सकल तीर्थ नो राय...
पूर्व नव्वाणु ऋषभदेव, ज्यां ठविया प्रभु पाय
केवल ज्ञानियों द्वारा भाषित इतिहास से...
श्री शत्रुंजयगिरी उपर मोक्ष पद को पाएँ...
अनंत सिद्ध भगवंतों को कोटिशः वंदन
[ प्राप्त जानकारी अनुसार ]
श्री भरत मुनि के साथ 5 करोड़
श्री पुंडीरिकस्वामीजी के साथ 5 करोड़
श्री अजितसेन मुनि के साथ 17 करोड़
श्री राम व भरत मुनि के साथ 3 करोड़
श्री पाँच पांडवों के साथ 20 करोड़
श्री सोमयशा मुनि के साथ 13 करोड़
श्री द्रविड़ और वारिखिल्ली के साथ १० करोड़
श्री शांतिनाथ भ. के चातुर्मास में 1.53 करोड़
श्री सागर मुनि के साथ 1 करोड़
श्री सार मुनि के साथ 1 करोड़
श्री कदम गणधर के साथ 1 करोड़
श्री नारद मुनि के साथ 91 लाख
श्री आदिव्य यशा मुनि के साथ 1 लाख
श्री वासुदेव की पत्नी के साथ 35 हजार
श्री देवकी के साथ 4 हजार
श्री अजितनाथ भ. के साधु 10 हजार
श्री शांतिनाथ भ. के साधु 10 हजार
श्री दमितारी मुनि के साथ 14 हजार
श्री थाव्च्चा पुत्र के साथ 1 हजार
श्री शुक्र परिव्राजक के साथ 1 हजार
श्री सुभव्रमुनि के साथ 700 सौ
श्री शैलकाचार्य के साथ 500 सौ
एवं अनंता - अनंत मुनिजन...
श्री शत्रुंजय सिद्धक्षेत्र है, दीठे दुर्गति वारे
भाव धरी ने जे चढ़े, तेने भाव पार उतारे
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【 3 】शत्रुंजय महातीर्थ की गौरवगाथा... भवोदधि तारक पावन महातीर्थ...
जम्बुद्वीप के महाविदेह क्षैत्र में विचरते श्री सीमंधरस्वामी भगवान की देशना अनुसार... भरतखंड में केवली भगवंतों के विरह काल में भी पांचवें आरे के जीवों को तारने वाला... जयवंता श्री शत्रुंजय गिरिराज विद्ध्यमान है l
श्री शत्रुंजय महातीर्थ जैसा एक भी तीर्थ नही है, जिसके शिखर पर 863 से अधिक शिखरबंधी जिनालय है, जहाँ 17000 से अधिक प्रभु प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित है l
इस महातीर्थ के 16 उद्धार हुए है, इस महातीर्थ पर प्रथम जिनालय उसी अवसर्पिणी काल में उन्ही के सांसारिक पुत्र राजा भरत चक्रवर्ती ने बनवाकर प्रभु आदिनाथ की प्रतिमा प्रतिष्ठित की थी l
शत्रुंजय महाकल्प में लिखा है, यदि मानव सभी तीर्थों की यात्रा करके आए और सिद्धगिरीराज की एक यात्रा करें तो भी उसे सौ गुणा फल मिलता है, इस भूमि का कण-कण, अणु-अणु पावन एवं पवित्र है, यहाँ अनंतानंत सिद्ध मोक्ष सिधारे है, उनके चरण स्पर्श से पावन हुआ है... यहाँ की भूमि का हर कण l
अनंत आस्थाओं के आयाम, शाश्वत गिरिराज, भव तारक श्री शत्रुंजय महातीर्थ... जहाँ अनंत आत्माओं के कर्म मालिन्य नष्ट हो जाते है...ऐसे प्रकट प्रभावी श्री सिद्धगिरिराज जहाँ...
अनेकानेक आत्माओं ने सिद्धत्व को प्राप्त किया... ऐसे श्री अजरामर शाश्वत तीर्थ की यात्रा का अवसर पूर्व के कई भवों के पुण्य का प्रभाव है...
हम बड़े पुण्यशाली है जिन्हें अनंत जीवयोनियों के महासागर को पार करने के पश्च्चात मानव भव प्राप्त हुआ है, वह भी जिनेश्वर परम्परा में...
हमारे जीवन का स्वर्णिम अहोभाग्य है, जहाँ दादा आदिनाथ प्रभु ने पूर्व नव्वाणु बार ( असंख्य बार ) यात्रा की, जिस तीर्थ की यात्रा अरिहंतों, अनंत सिद्धों, अनंत गुरुभगवंतों, अनंत पुण्य आत्माओं ने कर आत्मकल्याण किया, जिस भूमि के स्पर्श ने अनंत आत्माओं को बोध दिया...
यही तीर्थ हमें विरासत में मिला है...चालो सिद्धगिरि राज, मले मुक्ति नी पाज, गिरी सिद्ध अनंत नो ठाम छे
श्री शत्रुंजय महातीर्थ की यात्रा मानव के लिये जीवन का अनुपम अवसर है l
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【 4 】⛳ शत्रुंजय महातीर्थ सिद्ध भगवंतों की गौरव गाथा... भवोदधि तारक पावन महातीर्थ
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【 शत्रुंजय गिरी महिमा वर्णन 】
शत्रुंजय तीर्थ की महिमा, गरिमा की रचना सर्व प्रथम् रचना प्रभु ऋषभदेव भगवान् के आदेश से श्री पुण्डरीक स्वामीजी ने सवा लाख श्लोक प्रमाण "श्री शत्रुंजय महात्म्य" नामक ग्रंथ की अनेक आश्चर्यों युक्त्त रचना की l
वीर प्रभु के आदेश से श्री सुधर्मा स्वामीजी ने संक्षेप में चौबीस हजार श्लोक प्रमाण ग्रन्थ की रचना की l
शिलादिव्य के आग्रह से युग प्रधान आचार्य वर्तमान दादा की प्रतिमा के प्रतिष्ठाचार्य श्री धनेश्वर सुरीजी ने नो हजार श्लोक प्रमाण रचना की l
श्री शत्रुंजय माहाताभ्य का आगमों में श्री ज्ञाता धर्मकथा, अंतकृदशा में उल्लेख है l
प्राकृत भाषा में शत्रुंजय लघु बृहत कल्प में महिमा का सुंदर वर्णन मिलता है l
विविध तीर्थ कल्प, शत्रुंजय रास, तीर्थोद्वार प्रबन्ध में सुंदर महिमा है l
【 संघपति गरिमा का इतिहास 】
संघवी पद की महिमा परमात्मा से सुनकर भरत चक्रवर्ती प्रथम् संघपति बनें l संघ की ऋद्धि और महिमा - 32 हजार मंडलीक ( बड़े ) राजा, 84 लाख घोड़े, रत्नों से जड़े हुए पलाण वाले 84 लाख हाथी, 84 लाख रथ, 3 लाख निपुण मंत्रीश्वर व्यवस्था करते थे , 16 हजार यक्ष देवता भरत चक्रवर्ती के संघ की दिनरात सेवा करते थे । 48 कोस में संघ का पड़ाव होता था, 10 करोड़ यात्री फरकती ध्वजाएं पकड़ कर चलते थे, पैदल यात्रियों की संख्यां 96 करोड़ थी । भरत चक्रवर्ती की 64 हजार रानियाँ और उनके साथ 1 लाख 28 हजार दासियां साथ में थी । नवनिधि तथा 14 रत्न भी संघ की शोभा बढ़ाते थे । गांवों और नगरों में शासन प्रभावना करते करते संघ आगे बढ़ता था । निकट पहुँचते ही भरत चक्रवर्ती की आँखों से हर्ष की अश्रुधारा बहने लगी, महाराजा सहित सभी यात्री शत्रुंजय तीर्थ को धन्य धन्य कहने लगे, हीरा, पन्ना, रत्नों से गिरिराज को बधाया, गिरिराज की 3 प्रदिक्षणा देकर सभी आनन्द विभोर हो गए। गिरिराज पर सुवर्ण के मंदिर और रत्नों की प्रतिमाएँ विराजमान की l इस प्रकार अयोध्या से शत्रुंजय का भव्य छः रि पालित संघ निकाला साथ ही शत्रुंजय तीर्थ का प्रथम् उद्धार किया l
* 99 करोड़ 89 लाख 84 हजार भरत चक्रवर्ती के समय संघपति बनें l
* 50 करोड़ 95 लाख 75 हजार राजा सगर चक्रवर्ती के समय संघपति बनें l
* 25 करोड़ 95 लाख 75 हजार राजा पाण्डवों तथा जावडशा के समय संघपति बनें l
* इस प्रकार अवसर्पिणी काल में असंख्य संघपति बने l
* दशरथ महाराजा के संघ में 700 सोने से मढ़े हुए मंदिर, 800 संघपति 100 राजा एवं 5 करोड़ यात्री थे l
* रामचन्द्रजी के संघ में 500 सोने के मन्दिर 712 चांदी के 5012 लकड़ी के मन्दिर थे, 1 करोड़ यात्री, 20 करोड़ घोड़े और 10 हजार हाथी थे l
* पांच पांडवों के संघ में 300 सोने, 800 चांदी के मंदिर, 800 आचार्य, 8000 मुनि, 800 राजा, 1 करोड़ सेठियां और द्वारका से कृष्णजी थे l
* संप्रति महाराजा के संघ में 2080 प्रभुजी के रथ, 5000 आचार्य और 6 लाख यात्री थे l
* विक्रम महाराजा के संघ में 169 सुवर्ण मंदिर, 300 चांदी के, 800 चन्दन की लकड़ी के मंदिर, आचार्य सिद्धसेन सुरि, अन्य 500 आचार्य, हजारों मुनिराज, 70 लाख श्रावक परिवार - यह संघ शत्रुंजय से गिरनार होते हुए वापिस उज्जैन गया था l
इस प्रकार हर काल में सिद्धगिरि के करोड़ों संघपति बने, यही परम्परा आज भी निरन्तर प्रचलित है, हर जैनी की भावना होती है - वह चतुर्विद्ध संघ को भव्य गिरिवर की छः रि पालित यात्रा करवाएँ l
गिरिराज की महिमा ही इतनी भव्य है : गिरिराज की रज मोक्ष का सौभाग्य तिलक है, यहाँ के शुभ पुद्गलों की यात्रियों के मन पर परमात्मा के प्रति श्रद्धा प्रकट कराती है, सूक्ष्मता से कहे तो - गिरिराज का महात्म्य यहाँ से करोड़ों करोड़ आत्माओं द्वारा मोक्ष गति को प्राप्त करना ही है l
शास्त्रों में वर्णित है : इस गिरिराज की छः रि पालित यात्रा का आयोजक संघपति अवश्य ही मोक्षगामी बनता है, क्योंकि उसके आचार-विचार उन्हीं मोक्षगामी आत्माओं की तरह वीतरागी होते है ।शुभम् अस्तु l
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अहो भाग्य... दादा ऋषभदेव का इतिहास जानने को मिला, जिनकी धर्म देशना से करोड़ो करोड़ वर्ष बीत जाने के बाद, आज भी मानव के दिलों-दिमाग में करुणा, वात्सल्य, त्याग, अहिंसा आदि के साथ जीवन जीने के गुण मौजद है। इतिहास वर्णित है, इस तीर्थ की शुद्ध भाव और शुद्ध क्रिया से यात्रा, आराधना करने वाली आत्मा अवश्य ही सद्-गति मिलते हुए परम्-गति को प्राप्त करती है। शुभम् अस्तु।।
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भजन, स्तवन, कविता, सज्जाई आदि... प्रभु की वाणी से जुड़ने का सर्वाधिक सुगम मार्ग है, मन सरलता से एकाग्रहित हो जाता है । कुछ पल भी अगर हमारा मन वीतराग प्रभु की आराधना में लग जाय... तो जन्मों जन्म के पापकर्म क्षय हो सकते है । हम पुण्यकर्म बंध की ओर अग्रसर हो सकते है... शुभम् अस्तु।।
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【 6 】⛳ श्री शत्रुंजय महातीर्थ की भावयात्रा
भाग १
श्री शत्रुंजय महातीर्थ के जितने गुणगान किये जाएँ वे कम है, चॊदह राजलोक मे ऐसा एक भी तीर्थ नही है जिसकी तुलना शत्रुंजय तीर्थ से कर सके l
भव्य जीवों भावपूर्वक अरिहन्त प्रभु की आज्ञा अनुसार स्वयं को परिवर्तित करते हुए ... क्रमशः आने वाले सभी भवों में सुख-समृद्धि पाने, स्वर्ग और मोक्ष का टिकिट reserve करिये..._
वर्तमान मे भरतक्षेत्र में तीर्थंकर नहीं है, केवलज्ञानी नहीं है, विशिष्ट ज्ञानी भी नहीं है, फिर भी महाविदेह क्षेत्र की पुण्यशाली आत्मा भरत क्षेत्र के मानवी कॊ परम् सौभाग्यशाली मानते है, उसका एक मात्र कारण इस शाश्वत तीर्थ का भरत क्षेत्र में होना है ।
हम कितने भाग्यशाली है कि हमें यह शाश्वत तीर्थ मिला है, इस तीर्थ की बार ~ बार यात्रा करनी चाहिए l
नव्वाणुं प्रकार पूजा की ढाल में बताया हे कि....
'''जिम जिम ए गीरि भेटिये रे, तिम तिम पाप पलाय सलुणा""
ज्ञानी पुरुषों ने घर बेठे तीर्थयात्रा का फल लेने का सुगम शार्ट कट मार्ग बताया है यानी जो व्यक्ति प्रातःकाल प्रतिदिन इस तीर्थ की भाव यात्रा करता है उसे तीर्थ यात्रा का फल मिलता है, साथ ही २ उपवास का फल मिलता है l
इस प्रकार करें - भाव यात्रा, मन को एकाग्रहित करके...
१-) जहाँ परमात्मा की प्रतिमा या पगलिये होवें वहाँ ""नमो~जिणाणं"" बोलिये
२-) जहाँ मोक्षगामी महापुरुषों के पगलिये हो वहा ""नमो~सिध्दाणं"" बोलिये
३-) जहाँ देवी~देवताओं की प्रतिमा हो वहां ""प्रणाम"" करे
मेरे ह्रदय का हर अणु, उपकार का सुमिरन करे।
मेरे ह्रदय की धड़कने, प्रभु नाम का ही रटन करे।।
हे पास मेरे क्या प्रभु, जो आपको अर्पण करू।
ऐसे प्रभु श्री आदि जिन को, भाव से वंदन करूं ।।
अब आप सभी घर पर बेठे ~ बेठे अनुभव करे☝की आप पलीताणा शहर की धर्मशाला में ठहरे हुए है बस उस पल का इमेजिन करें..
तलेटी रोड पर आने वाले जिनालयों को "" नमॊ~जिणाणं"" करें
अब आप धर्मशाला से पूजा की जोड व अष्टप्रकारी पूजा की सामग्री ले कर खुले पैर यात्रा शुरु करे...
अब गिरिराज के पास पहुँचते ही दाए हाथ की तरफ आगम मन्दिर है यहाँ पर नमो ~ जिणाणं करे
अब आगे गिरिराज के पास पहुँचते ही ""अधिष्टायक देव"" कवड यक्ष की देहरी को प्रणाम करे
गिरिराज की यात्रा प्रारम्भ हो रही है...
सिद्धाचल समरुं सदा, सोरठा देश मोझार
मनुष्य जन्म पामी करी, वंदु वार हजार👏
एकेकु डगलुं भरे, शेत्रुजा सामु जेह
ऋषभ कहे भव क्रोडना, कर्म खपावे तेह
शत्रुंजय समो तीरथ नहीं, ऋषभ समो नहीं देव
गोतम सरीखा गुरु नही, वळी वळी वंदु तेह
आयो हु आयो आदिनाथ, ओ सिद्धाचल वाले,
तुम हो सिद्धाचल वाले ,तुम हो विमलाचल वाले।
सोवन अरु मोवन तारी, मुरत नी महिमा भारी,
दिल में बिराजो मेरे नाथ, हो सिद्धाचल वाले।।
इस तीर्थ के कंकर ...पत्थर हम बन जाये
भक्ति पथ पर चलकर ... दर्शन तेरा पाए
अन्तिम इच्छा पूरी होवे ...जीवन हो सुख कारा...
सर्व प्रथम "" जय तलेटी"" में सिद्धशिला व श्री आदिनाथ दादा आदि की ११ देहरियों को नमो ~ जिणाणं करे
अब बाये हाथ की तरफ "" श्री धर्मनाथजी"" के जिनालय में नमो ~ जिणाणं करें
दाहिनी तरफ प्राचीन जैन सरस्वती देवीजी कॊ नमन करे
अब आगे बाबूजी के मन्दिरजी में प्रवेश करे, बाई तरफ ऊपर ""श्री गौतम स्वामीजी को वन्दन व जल मन्दिरजी में ""श्री महावीर स्वामीजी"" को नमो ~ जिणाणं करे
मुलनायक ""आदिनाथ दादा"" को नमो ~ जिणाणं करे
अब बाहर निकलने पर दाहिनी तरफ समवसरण मन्दिरजी को नमो ~ जिणाणं करें
अब ऊपर की तरफ यात्रा शुरु करते है ॥ यहाँ से थोडा आगे चलने पर दाए हाथ की तरफ भरत महाराजा के पगलिये है यहां पर नमो ~ सिध्दाणं करे
आगे दाई तरफ ""श्री नेमीनाथजी"" की देहरी है यहाँ पर नमो~जिणाणं करे
अब हम भाव यात्रा में पहुँच गये है "हिगंलाज" के हाडे पर ""हिगंलाज माता"" को प्रणाम करे
इसका हिंगुल नाम इसलिए पड़ा क्यू की हिंगुल नामक राक्षस गिरिराज पर चढ़ने वाले यात्रियों पर उपद्रव करता था इस कारण यहां किसी तपस्वी संत पुरुष ने स्व तप और ध्यान के प्रभाव से अम्बिका देवी को प्रत्यक्ष करके कहा यह हिंगुल राक्षस जो यात्रियों को परेशान करता है उसे तुम दूर करों जिससे यात्रीगण सुखपूर्वक गिरीराज की यात्रा कर सके । इस पर अम्बिका देवी ने उस राक्षस के साथ युद्ध करके परास्त किया । लगभग मृत्यु की अवस्था में पहुंच गया तब राक्षस ने देवी की शरण स्वीकार कर निवेदन किया की हे माँ आज से आप मेरे नाम से जानी जाओ और इस तीर्थ क्षेत्र में मेरे नाम की स्थापना करो l ऐसा कुछ करो की मैं कदापि किसी को भी पीड़ा नहीं पहुंचाउंगा । देवी ने उसकी प्रार्थना का मान रखा, तत्पश्चात वह राक्षस अदृश्य हो गया और मृत्यु की गोद में समां गया । तभी से अम्बिका देवी यहाँ श्री सिद्धाचाल की टेकरी पर अधिष्ठात्री देवी होकर रही और हिंगलाज माता के रूप में पूजी जाने लगी । अतः इस टेकरी का स्थान " हिंगलाज माता का हेडा" के नाम से प्रसिद्ध हुआ l
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6/ 2. भाग - श्री शत्रुंजय महातीर्थ की भावयात्रा -
श्री शत्रुंजय महातीर्थ के जितने गुणगान किये जाएँ वे कम है...
अब भाव यात्रा में आगे की ओर प्रस्थान करते है गाते झूमते हुए.....
सिध्दाचल शिखरों दिवो रे, आदेश्वर अलबेलो रे
बोलो बोलो बोलो बोलो रे, आदेश्वर अलबेलो रे
आगे श्री कलिकुण्ड पार्श्वनाथजी की देहरी पर नमो~जिणाणं करे अब नये रास्ते से उपर जाने पर बाई तरफ चार शाश्वत जीनेश्वर की देहरियो पर नमो ~ जिणाणं"" करे फिर आगे दाई तरफ श्री पूज्यजी की टुंक के अन्दर चौबीसो भगवान की केवलज्ञान की मुद्रा में वृक्ष सहित चोबीस देहरी पर नमो ~ जिणाणं करे
अब आगे भव्य देहरी में पद्मावती माताजी व मणिभद्रजी को प्रणाम करे
आगे सीधे चलने पर दाएं हाथ की तरफ द्रविड वारी खिल्लजी की देहरी पर नमो ~ सिध्दाणं करे
थोडा आगे जाने पर राम ~ भरतादि की देहरी पर ""नमो सिद्धाणं करे
अब आगे बाएँ हाथ पर नमि ~ विनामी"" की देहरी पर नमो ~ सिद्धाणं करे
आगे हनुमान धारा में नमो ~ सिद्धाणं करे
अब भाव यात्रा में हम नवटुंक के रास्ते से यहा पर आ गये है यहाँ से सीधे ना चलकर नवटुंक की ओर प्रस्थान करेंगे
पहली टुंक - चौमुखजी
श्री आदिनाथजी को - नमो जिणाणं
दुसरी टुंक - छीपावसही
श्री आदिनाथजी को - नमो जिणाणं
तीसरी टुंक - साकरवसी -
श्री चिंतामणि पार्श्वनाथजी को - नमो जिणाण
चोथी टुंक - नन्दीश्वर द्विप -
श्री बावन जिनालय को - नमो जिणाणं
पांचवी टुंक - हेमा बाई -
श्री अजितनाथजी को - नमो जिणाणं
छट्ठी टुंक - प्रेमा भाईमोदी -
श्री आदिनाथजी को - नमो जिणाणं
सातवीं टुंक - बाला ~ भाई -
श्री आदिनाथजी को - नमो जिणाणं
आठवीं टुंक - मोती शाह शेठ -
श्री आदिनाथजी को - नमो जिणाणं
जयकारा दादा आदेश्वरजी का - जय आदिनाथजी - जय गिरिराजजी
नवमीं टुंक - में जाते हुए वाघन पोल में प्रवेश करते है
श्री शांतिनाथजी - जिनालय - नमो जिणाणं
स्तुति
सुधासोदरवाग्ज्योत्स्त्रा, निर्मलीक्रतदिड्मुखः
म्रगलक्ष्माः तमः शान्त्यै, शान्तिनाथजिनोस्तु वह
अब यहां से आगे चलकर बाएँ हाथ नीचे की तरफ उतरने पर संघ रक्षिका चक्रेक्ष्वरी माताजी को प्रणाम
आगे ""वाघेक्ष्वरी देवी पद्मावती माताजी व निर्वाण देवी"' को प्रणाम
अब उपर चलने पर ""कवडयक्ष"" की देहरी को प्रणाम
अब उपर चलने पर दोनो तरफ सैंकडों मन्दिर है - सभी मन्दिरों को - नमो ~ जिणाणं
अब हाथी पोल से उपर चढते ही
दादा "'श्री आदिनाथजी""
के दर्शन करते ही मन रोमांचित हो जाता है
सिद्धाचल शिखरे दिवो रे आदेश्वर अलबेलो रे
जय जय श्री आदिनाथजी
नमो ~ जिणाण : दादा - स्तुती
आदिमं प्रथिवीनाथ मादिमं निष्परिग्रहः
आदिमं तीर्थनाथं च ऋषभस्वामिनं स्तुमः
अब दादा के दरबार की प्रदक्षिणा में आने वाले सहस्त्रकुट, समसवरण, सम्मेदशिखर, अष्टापद, एवं सभी परमात्माओं को नमो ~ जिणाणं
ओर ""रायण पगला"" पर नमो ~ जिणाण
अब "'पुंडरिक स्वामीजी"" को नमो ~ सिध्दाणं
अब चौमुख प्रतिमाओं व श्री आदिनाथ दादा सहित सभी प्रतिमाओं को नमो ~ जिणाणं
अब "'मुख्य टुंक दादा के दरबार"' में पूजा के वस्त्रों में प्रवेश करें, दादा की अष्टप्रकारी पूजा करें - जल, चंदन, पुष्प, धुप, दीपक, अक्षत, नैवेध, फल । विधि आदि करने बाद नीचे की ओर प्रस्थान...
अब सामने पुंडरिक स्वामीजी"" को नमो~सिध्दाणं
अब दोनों तरफ आने वाले समस्थ भगवानजी को ""नमो ~ जिणाणं"
जयकारा दादा आदेश्वरजी का, जय आदिनाथजी, जय गिरिराजजी
और समस्थ देवी-देवताओं को प्रणाम
अब राम पोल आने पर भाव विभोर होते हुए - सिद्धाचल शिखरें दिवो रे, आदेश्वर अलबेलो रे... गाते हुएं नीचे ""जय तलेटी"" पर आकर गिरिराज को भाव पूर्वक नमन करें, नमो ~ जिणाणं
प्रथम ""तीर्थंकर भगवान श्री ऋषभ देवजी"' कहते है की शत्रुंजय महातीर्थ के सम्मुख एक एक कदम चलने पर एक करोड़ पापकर्मो का क्षय होता है - इतनी कर्म निर्जरा होती है ॥
१४ क्षेत्र में इस भव्य तीर्थाधिराज के ऐसे अनुपम प्रभाव सुनकर भव्य जीवों में भक्ति उमड जाती है l
मुझ बालक से भाव यात्रा कराने में कोई गलत हुई हो तो क्षमा करें, मिचछामिं~दुक्कडम l
नियमित रुप से श्री शत्रुंजय गिरीराज की भाव~यात्रा कर भरपुर पुण्य उपार्जन कर.. परम् पद की प्राप्ति करें l
🙏🏼 जय आदिनाथजी 🚩जय गिरिराजजी
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अहो भाग्य... श्री शत्रुंजय महातीर्थ की भाव यात्रा करने का अनुपम अवसर मिला, तीर्थ की धर्म देशना से करोड़ो करोड़ वर्ष बीत जाने के बाद, आज भी मानव के दिलों-दिमाग में करुणा, वात्सल्य, त्याग, अहिंसा आदि के साथ जीवन जीने के गुण मौजूद है। इतिहास वर्णित है, इस तीर्थ की शुद्ध भाव और शुद्ध क्रिया से यात्रा, आराधना करने वाली आत्मा अवश्य ही सद्-गति मिलते हुए परम्-गति को प्राप्त करती है। शुभम् अस्तु।।
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【 7 】⛳ शत्रुंजय महातीर्थ सिद्ध भगवंतों की गौरव गाथा..भवोदधि तारक पावन महातीर्थ
🅰 शत्रुंजय तीर्थ पर विराजमान श्री ऋषभदेव भगवान् की वर्तमान प्रतिमाजी
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वर्तमान प्रतिमाजी की शिला रत्न तुल्य है, यह श्री वस्तुपाल मंत्री ने वि. स. १२०० में मम्माणी खाण से मुंह मांगी कीमत देकर लायी थी । यह रत्नतुल्य शिला ३०० वर्ष संघ के अधिकार में भोयरे में सुरक्षित्त रही l लगभग ३८० वर्षों तक हजारों व्यक्ति इस शिला की पुजा - पक्षाल करते रहे, फिर भी यह शिला उसी तेज, चमक, सुंदरता के साथ उसी रंगरूप में विराजित रही l
वि. स. १५८७ में यह शिला परमात्मा बनी और जगत की तारणहार बनी । इस अलौलिक प्रतिमाजी को विराजमान ( प्रतिष्ठा ) कराने वाले आचार्य श्री विद्यामंडन सुरिश्वरजी म. साहेब ने अपना नाम प्रतिमाजी पर नही लिखवाया l
यह प्रतिमा पांचवें आरे के २१००० वर्ष यानि आज से १८५०० वर्षों तक विराजमान रहेगी l
गिरिराज पर आठवीं मोतीशा टूंक में श्री पुण्डरीक स्वामीजी की प्रतिमा अति सुंदर है । गिरिराज पर नवा आदेश्वर भगवान् पांच भाया का मंदिर, 14 रत्नों का मंदिर, बाजरिया देरासर, सहस्त्रफणा पार्श्वनाथ, वीस विहरमान मंदिर, सम्मेतशिखरजी का मंदिर, मेरुशिखर सभी विमलवसही में है l
रायण पगला मंदिर पर स्थित रायण वृक्ष अनादि काल से है, इस मंदिर और पुण्डरीक स्वामीजी मंदिर की प्रतिष्ठा भी १५८७ वैसाख वदी ६ को हुई थी l
संप्रति महाराजा, कुमारपाल राजा, वस्तुपाल - तेजपाल मंत्रीश्वर, पेथड़शाह, समराशाह, विक्रम सातावाहन राजा, बाहड़मंत्री इत्यादि महापुरुषों के महान मंदिर इस गिरिराज पर सुशोभित है । यहां जोधपुर के मुथा परिवार का १०० स्तम्भों वाला वीर प्रभु का मंदिर है l
इस गिरिराज पर २० भुवनेन्द्र, ३२ व्यतरेन्द्र, २ ज्योतिन्द्र, १० उधर्वलोक वासी वैमानिकों के इन्द्र - इस प्रकार ६४ इंद्रों ने वीर प्रभु की देशना सुनी l
🙏🏼 भगवान् आदेश्वर दादा का मुखारविंद गंभीर है, चेहरा गोलाकार है, भगवान् के गर्दन ऊपर का चेहरा बराबर शिल्प शास्त्र के हिसाब से सप्रमाण है । परिकर अति सुंदर, शोभायमान, भव्य बना हुआ है, दादा के शरीर के अवयव उदर, जंघा, पैर कुशल शिल्पीओं ने खंतपूर्वक बनाये है । भगवान् के हाथ का मोड़ मरोड़ मूर्ति शिल्प की प्रधान शैली अनुकूल है l दादा की भव्य मूर्ति के तेज भरे नयन1 देखकर भक्त गदगद हो जाते है। दादा की मूर्ति लावण्य झरती, अतिभव्य, अति आकर्षक और सप्रमान बनी है ।
इस गिरिराज पर करोड़ों करोड़ आत्माएँ सिद्ध गति को प्राप्त हुई, अतः इसका कण कण अमृत तुल्य जीवों का उद्धारक है । हे गिरिराज तुम देवगण की देव भूमि में तीर्थ तिलक रूप हो, तुम अमर हो, तुम सिद्ध पगधार हो - हे तीर्थाधिराज क्षणे क्षणे आपके स्पर्श से हमारी भावनायें उच्च बनती रहें, में कृपालु आदिनाथ प्रभु के चरणों में सदैव समर्पित हो जाऊं - ऐसी कृपा कर प्रभु l
✍🏼 रचना : प. पू. आ. श्री हिमांशु सुरिश्वरजी म. सा. - ग्रन्थ शत्रुंजय की महिमा और गरिमा
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अहो भाग्य... दादा ऋषभदेव का इतिहास जानने को मिला, जिनकी धर्म देशना से करोड़ो करोड़ वर्ष बीत जाने के बाद, आज भी मानव के दिलों-दिमाग में करुणा, वात्सल्य, त्याग, अहिंसा आदि के साथ जीवन जीने के गुण मौजद है। इतिहास वर्णित है, इस तीर्थ की शुद्ध भाव और शुद्ध क्रिया से यात्रा, आराधना करने वाली आत्मा अवश्य ही सद्-गति मिलते हुए परम्-गति को प्राप्त करती है। शुभम् अस्तु।।
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【 8 】⛳ शत्रुंजय महातीर्थ सिद्ध भगवंतों की गौरव गाथा..भवोदधि तारक पावन महाती
इस पुनीत पावन दिवस पर अनुकूलता हो तो प्रत्येक जैन को पालिताना पहुंच कर अनन्ता अनन्त ( करोड़ों करोड़ ) आत्माओं को सिद्धगति प्रदान करने वाले इस गिरिराज की महायात्रा जरुर कर अपना जन्म सार्थक करना चाहिए...
❗ यात्रा में निम्न बातो का ध्यान अवश्य रखें...
*१. सूर्योदय से यात्रा शुरू न कर सके तो कम से कम अँधेरा हटने के बाद गिरिराज पर चढना शुरू करना चाहिए
*२. यथा शक्ति चलकर ही यात्रा करनी चाहिए डोली में यात्रा न करे, चलकर यात्रा न कर सके तो तलेटी की यात्रा ही करके भी पुण्य कमा सकते है
*३. जय तलेटी सिद्धगिरी का चरण है, और चरण-वंदन की महिमा हम सभी जानते है
*४. गिरिराज के ऊपर शक्य हो तो वापरना नही चाहिए यदि शक्ति न हो तो पानी वापर सकते है
*५. गिरिराज पर यात्रा के दौरान जय तलेटी, शांतिनाथ भगवान्, रायण पगलाजी, पुंडरिक स्वामी एवं श्री आदेश्वर भगवान् कुल पाँच चैत्यवंदन करने चाहिए
*६. यथाशक्ति तप आराधना करें
*७. गिरिराज की आशाताना हो ऐसा कोई भी कृत्य नही करना चाहिए जैसे शौच, थूकना, प्लास्टिक आदि कचरा नही फैकना चाहिए
*८. यात्रा पूर्ण हो जाने के बाद नीचे उतरकर भाता का लाभ लेना-देना चाहिए, बाहर खोमचे की चीजे नही खाएं
*९. जिनालय में प्रभु को सिर्फ सुखी चीजे ही चढ़ाएं, रकम हो तो कल्याणजी आनंदजी पेढ़ी में जमा कराएँ, जो तीर्थ की देख-रेख का कार्य सुचारू रूप से कर रहें, अनुमोदनीय है
*१०. तीर्थ में जीव-हिंसा की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए, यह सर्वोपरि धर्म है
*११. मन-वचन और काया से ब्रह्मचर्य का पालन करें
*१२. जहां ठहरे हुए है : वहां के नियमों का पालन करें
*१३. हमारे द्वारा जाने, अनजाने में भी पाप-कर्म बंध ना हो... जिस तरह तीर्थ भूमि पर किये पुनीत कार्यों का सैकड़ों गुणा पुण्य-कर्म बंध होता है, उसी तरह पापमयी कार्यों का भी सैकड़ों गुणा पाप-कर्म बंध होता है... विशेष संज्ञान में लेवें
*१४. तीर्थ भूमि पर यथा शक्ति दान -धर्म की भावना रखनी चाहिये l
*१५. गिरिवर तीर्थ यात्रा पूर्ण कर आने के बाद "भाता गृह", "कल्याणजी आनन्दजी" पेढ़ी की ऑफिस अवश्य visit करने का भाव रखें, यथा शक्ति विभिन्न योजनाओं में दान-धर्म पुण्य कर - पुण्य से ही उपार्जित लक्ष्मी का सद्1उपयोग करें l
⛳ इस पुण्यमयी शाश्वत तीर्थ पर ५०० धनुष की काया वाले इस भरत क्षेत्र के प्रथम् तीर्थंकर श्री ऋषभदेव भगवान् यहां पूर्व नवाणु वार शत्रुंजयगिरी पधारें, साथ में ८४ लाख वर्ष पूर्व की उम्रवाले ८४ गणधर पधारे, ८४ हजार मुनि, ३ लाख साध्वीजी, ३ लाख ५ हजार श्रावक और ५.५४ लाख श्रविकाएँ पधारे।
प्रभु ने रायण वृक्ष के निचे, पूर्व नव्वाणु वार देवताओं द्वारा बनाये समोवसरण में देशना दी थी। यह समोवसरण एक योजन विस्तार वाला एवं अढि गाउ ऊँचा, रत्न-सुवर्ण वाला, चारों तरफ 20 हजार सीढ़ियों वाला असंख्य बार देवताओं ने बनाया। प्रभु यहाँ हर फागुण सुदी 8 को धर्मदेशना देते थे।
चक्रवर्ती भरत के द्वारा भराई गयी 500 धनुष के आकार एवं अमूल्य रत्नों की प्रतिमाजी को चौथे आरे के आरंभ में सगर चक्रवती ने चिल्लण तालाब के निकट कोठा फल के वृक्ष के निचे गुफा में स्थापित कर दी थी l
प्रेषक ; जिन-गुरु : अमृत-वाणी, चैन्नई-बागरा
अहो भाग्य... श्री शत्रुंजय शाश्वत तीर्थ की यात्रा करने का अनुपम अवसर मिला । यहाँ भरत क्षेत्र के प्रथम् तीर्थंकर की धर्म देशना के करोड़ो करोड़ वर्ष बीत जाने के बाद, आज भी मानव के दिलों-दिमाग में करुणा, वात्सल्य, त्याग, अहिंसा आदि के साथ जीवन जीने के गुण मौजद है। इतिहास वर्णित है, इस तीर्थ की शुद्ध भाव और शुद्ध क्रिया से यात्रा, आराधना करने वाली आत्मा अवश्य ही सद्-गति मिलते हुए परम्-गति को प्राप्त करती है। शुभम् अस्तु।।
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【 9 】प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव भगवान का संक्षिप्त् इतिहास..
श्री ऋषभदेव भगवान का गर्भावतार-
भगवान् के गर्भ में आने के छह महीने पहले इन्द्र की आज्ञा से कुबेर ने माता के आंगन में साढ़े सात करोड़ रत्नों की वर्षा की थी। किसी दिन रात्रि के पिछले प्रहर में रानी मरुदेवी ने ऐरावत हाथी, शुभ्र बैल, हाथियों द्वारा स्वर्ण घंटों से अभिषिक्त लक्ष्मी, पुष्पमाला आदि सोलह स्वप्न देखे। प्रातः पतिदेव से स्वप्न का फल सुनकर अत्यन्त हर्षित हुईं। उस समय अवसर्पिणी काल के सुषमा दुःषमा नामक तृतीय काल में चैरासी लाख पूर्व तीन वर्ष, आठ मास और एक पक्ष शेष रहने पर आषाढ़ कृष्ण द्वितीया के दिन उत्तराषाढ़ नक्षत्र में वज्रनाभि अहमिन्द्र देवायु का अन्त होने पर सर्वार्थसिद्धि विमान से च्युत होकर मरुदेवी के गर्भ में अवतीर्ण हुए। उस समय इन्द्र ने आकर गर्भकल्याणक महोत्सव मनाया। इन्द्र की आज्ञा से श्री, आदि देवियाँ और दिक्कुमारियाँ माता की सेवा करते हुए काव्यगोष्ठी, सैद्धान्तिक चर्चाओं से और गूढ़ प्रश्नों से माता का मन अनुरंजित करने लगीं l
भगवान ऋषभदेव का जन्म महोत्सव-
नव महीने व्यतीत होने पर माता मरुदेवी ने चैत्र कृष्ण नवमी के दिन सूर्योदय के समय मति-श्रुत-अवधि इन तीनों ज्ञान से सहित भगवान् को जन्म दिया। सारे विश्व में हर्ष की लहर दौड़ गई। इन्द्रों के आसन कम्पित होने से, कल्पवृक्षों से पुष्पवृष्टि होने से एवं चतुर्निकाय देवों के यहां घंटा ध्वनि, शंखनाद आदि बाजों के बजने से भगवान का जन्म हुआ है ऐसा समझकर सौधर्म इन्द्र ने इन्द्राणी सहित ऐरावत हाथी पर चढ़कर नगर की प्रदक्षिणा करके भगवान को सुमेरु पर्वत पर ले जाकर १००८ कलशों से क्षीरसमुद्र के जल से भगवान का जन्माभिषेक किया। अनन्तर वस्त्राभरणों से अलंकृत करके 'ऋषभदेव' यह नाम रखा। इन्द्र अयोध्या में वापस आकर स्तुति, पूजा, तांडव नृत्य आदि करके स्वस्थान को चले गये l
भगवान ऋषभदेव का विवाहोत्सव-
भगवान् के युवावस्था में प्रवेश करने पर महाराजा नाभिराज ने बड़े ही आदर से भगवान् की स्वीकृति प्राप्त कर इन्द्र की अनुमति से कच्छ, सुकच्छ राजाओं की बहन 'यशस्वती', 'सुनन्दा' के साथ श्री ऋषभदेव का विवाह सम्पन्न कर दिया l
भरत चक्रवर्ती आदि का जन्म- यशस्वती देवी ने चैत्र कृष्ण नवमी के दिन भरत चक्रवर्ती को जन्म दिया तथा क्रमशः निन्यानवे पुत्र एवं ब्राह्मी कन्या को जन्म दिया। दूसरी सुनन्दा महादेवी ने कामदेव भगवान बाहुबली और सुन्दरी नाम की कन्या को जन्म दिया। इस प्रकार एक सौ तीन पुत्र, पुत्रियों सहित भगवान ऋषभदेव, देवों द्वारा लाये गये भोग पदार्थों का अनुभव करते हुए गृहस्थ जीवन व्यतीत कर रहे थे l
भगवान द्वारा पुत्र-पुत्रियों का विद्याध्ययन-
भगवान ऋषभदेव गर्भ से ही अवधिज्ञानधारी होने से स्वयं गुरु थे। किसी समय भगवान ब्राह्मीसुन्दरी को गोद में लेकर उन्हें आशीर्वाद देकर चित्त में स्थित श्रुतदेवता को सुवर्णपट्ट पर स्थापित कर 'सिद्धं नमः' मंगलाचरणपूर्वक दाहिने हाथ से 'अ, आ' आदि वर्णमाला लिखकर ब्राह्मी कुमारी को लिपि लिखने का एवं बायें हाथ से सुन्दरी को अनुक्रम के द्वारा इकाई, दहाई आदि अंक विद्या को लिखने का उपदेश दिया था। इसी प्रकार भगवान ने अपने भरत, बाहुबली आदि सभी पुत्रों को सभी विद्याओं का अध्ययन कराया था l
असि-मषि आदि षट्क्रियाओं का उपदेश-
काल प्रभाव से कल्पवृक्षों के शक्तिहीन हो जाने पर एवं बिना बोये धान्य के भी विरल हो जाने पर व्याकुल हुई प्रजा नाभिराज के पास गई। अनन्तर नाभिराज की आज्ञा से प्रजा भगवान ऋषभदेव के पास आकर रक्षा की प्रार्थना करने लगी। प्रजा1 के दीन वचन सुनकर भगवान ऋषभदेव अपने मन में सोचने लगे कि पूर्व-पश्चिम विदेह में जो स्थिति वर्तमान है वही स्थिति आज यहाँ प्रवृत्त करने योग्य है। उसी से यह प्रजा जीवित रह सकती है। वहां जैसे असि, मषि आदि षट्कर्म हैं, क्षत्रिय आदि वर्ण व्यवस्था, ग्राम-नगर आदि की रचना है वैसे ही यहां भी होना चाहिये। अनन्तर भगवान ने इन्द्र का स्मरण किया और स्मरणमात्र से इन्द्र ने आकर अयोध्यापुरी के बीच में जिनमंदिर की रचना करके चारों दिशाओं में जिनमन्दिर बनाये। कौशल, अंग, बंग आदि देश, नगर बनाकर प्रजा को बसाकर प्रभु की आज्ञा से इन्द्र स्वर्ग को चला गया। भगवान ने प्रजा को असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प इन छह कर्मों का उपदेश दिया। उस समय भगवान सरागी थे। क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन तीन वर्णों की स्थापना की और अनेकों पाप रहित आजीविका के उपाय बताये। इसीलिये भगवान युगादिपुरुष, आदिब्रह्मा, विश्वकर्मा, स्रष्टा, कृतयुग विधाता और प्रजापति आदि कहलाये। उस समय इन्द्र ने भगवान का साम्राज्य पद पर अभिषेक कर दिया l
भगवान का वैराग्य और दीक्षा महोत्सव-
किसी समय सभा में नीलांजना के नृत्य को देखते हुए बीच में उसकी आयु के समाप्त होने से भगवान को वैराग्य हो गया। भगवान ने भरत का राज्याभिषेक करते हुए इस पृथ्वी को 'भारत' इस नाम से सनाथ किया और बाहुबली को युवराज पद पर स्थापित किया। भगवान महाराज नाभिराज आदि को पूछकर इन्द्र द्वारा लाई गई 'सुदर्शना' नामक पालकी पर आरूढ़ होकर 'सिद्धार्थक' वन में पहुंचे और वटवृक्ष के नीचे बैठकर ' नमः सिद्धेभ्यः 'मन्त्र का उच्चारण कर पंचमुष्टि केशलोंच करके सर्व परिग्रह रहित मुनि हो गये। उस स्थान की इन्द्रों ने पूजा की थी इसीलिये उसका 'प्रयाग' यह नाम प्रसिद्ध हो गया अथवा भगवान ने वहां प्रकृष्ट रूप से त्याग किया था इसीलिये भी उसका नाम प्रयाग हो गया था1। उसी समय भगवान ने छह महीने का योग ले लिया। भगवान के साथ आये हुए चार हजार राजाओं ने भी भक्तिवश नग्न मुद्रा धारण कर ली l
पाखंड मत की उत्पत्ति - भगवान के साथ दीक्षित हुए राजा लोग दो-तीन महीने में ही क्षुधा, तृषा आदि से पीड़ित होकर अपने हाथ से वन के फल आदि ग्रहण करने लगे। इस क्रिया को देख वन देवताओं ने कहा कि मूर्खों! यह दिगम्बर वेष सर्वश्रेष्ठ अरहंत, चक्रवर्ती आदि के द्वारा धारण करने योग्य है। तुम लोग इस वेष में अनर्गल प्रवृत्ति मत करो। यह सुनकर उन लोगों ने भ्रष्ट हुये तपस्वियों के अनेकों रूप बना लिये, वल्कल, चीवर, जटा, दण्ड आदि धारण करके वे पारिव्राजक आदि बन गये। भगवान ऋषभदेव का पौत्र मरीचिकुमार इनमें अग्रणी गुरू परिव्राजक बन गया। ये मरीचि कुमार आगे चलकर अंतिम तीर्थंकर महावीर हुए हैं l
भगवान का आहार ग्रहण - जगद्गुरु भगवान छह महीने बाद आहार को निकले परन्तु चर्याविधि किसी को मालूम न होने से सात माह नौ दिन और व्यतीत हो गये अतः एक वर्ष उनतालीस दिन बाद भगवान कुरुजांगल देश के हस्तिनापुर नगर में पहुंचे। भगवान को आते देख राजा श्रेयांस को पूर्व भव का स्मरण हो जाने से राजा सोमप्रभ के साथ श्रेयांसकुमार ने विधिवत् पड़गाहन आदि करके नवधाभक्ति से भगवान को इक्षुरस का आहार दिया। वह दिन वैशाख शुक्ला तृतीया का था जो आज भी 'अक्षय तृतीया' के नाम से प्रसिद्ध है l
भगवान को केवलज्ञान की प्राप्ति - हजार वर्ष तपश्चरण करते हुए भगवान को पूर्वतालपुर के उद्यान में-प्रयाग में वटवृक्ष के नीचे ही फाल्गुन कृष्णा एकादशी के दिन केवलज्ञान प्रकट हो गया। इन्द्र की आज्ञा से कुबेर ने बारह योजन प्रमाण समवसरण की रचना की। समवसरण में बारह सभाओं में क्रम से १.सप्तऋद्धि समन्वित गणधर देव और मुनिजन २. कल्पवासी देवियाँ ३. आर्यिकायें और श्राविकायें ४. भवनवासी देवियाँ ५. व्यन्तर देवियाँ ६. ज्योतिष्क देवियाँ ७. भवनवासी देव ८. व्यन्तर देव ९. ज्योतिष्क देव १०. कल्पवासी देव ११. मनुष्य और १२. तिर्यंच बैठकर उपदेश सुनते थे। पुरिमताल नगर के राजा श्री ऋषभदेव भगवान के पुत्र ऋषभसेन प्रथम गणधर हुए। ब्राह्मी भी आर्यिका दीक्षा लेकर आर्यिकाओं में प्रधान गणिनी हो गयीं। भगवान के समवसरण में ८४ गणधर, ८४००० मुनि, ३५०००० आर्यिकायें, ३००००० श्रावक, ५००००० श्राविकायं, असंख्यातों देव देवियाँ और संख्यातों तिर्यंच उपदेश सुनते थे l
ऋषभदेव का निर्वाण - जब भगवान की आयु चौदह दिन शेष रही तब अष्टापद ( कैलाश ) पर्वत पर जाकर योगों का निरोध कर माघ कृष्ण चतुर्दशी के दिन सूर्योदय के समय भगवान पूर्व दिशा की ओर मुँह करके अनेक मुनियों के साथ सर्वकर्मों का नाशकर एक समय में सिद्धलोक में जाकर विराजमान हो गये। उसी क्षण इन्द्रों ने आकर भगवान का निर्वाण कल्याणक महोत्सव मनाया था, ऐसे ऋषभदेव जिनेन्द्र सदैव।मार्गदर्शन कर हमारी रक्षा करें l
भगवान के मोक्ष जाने के बाद तीन वर्ष, आठ माह और एक पक्ष व्यतीत हो जाने पर चतुर्थ काल प्रवेश करता है। प्रथम तीर्थंकर का तृतीय काल में ही जन्म लेकर मोक्ष भी चले जाना यह हुंडावसर्पिणी के दोष का प्रभाव है।
महापुराण में भगवान ऋषभदेव के 'दशावतार' नाम भी प्रसिद्ध हैं। १. विद्याधर राजा महाबल २. ललितांग देव ३. राजा वज्रजंघ ४. भोगभूमिज आर्य ५.श्रीधर देव ६. राजा सुविधि ७. अच्युतेन्द्र ८. वज्रनाभि चक्रवर्ती ९. सर्वार्थसिद्धि के अहमिन्द्र १०. भगवान ऋषभदेव। इन भगवान को ऋषभदेव, वृषभदेव, आदिनाथ, पुरुदेव और आदिब्रह्मा भी कहते हैं l
प्रथम तीर्थकर आदिनाथ प्रभु के च्यवन, जन्म, दीक्षा, केवलज्ञान एवं मोक्ष ( निर्वाण ) कल्याणक पर आदिनाथ भगवान के चरण कमल में वंदन l
⛳ श्री शत्रुंजय गिरिराज पर आदेश्वर दादा का जिनालय जो वर्तमान तक चल रहा : लाखों करोड़ वर्षों में इस जिनालय के सिर्फ 16 उद्धार हुए है । सोलहवां उद्धार : वि. स. 1587 में कर्माशाह ने करवाया था । इस गिरिराज पर 124 जिनालय, 739 देहरियाँ, 11474 प्रतिमाजी और 8861 चरण पादुकाएं है l गिरिराज पर जाने के लिए 3364 सीढियां है l
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