अनुमोदना 🙏🏻
अनुमोदना का अर्थ है — दूसरों के अच्छे या बुरे कार्य को , शुभ या अशुभ कार्य को, स्वीकृति देना , सहमति देना , उनके कार्य की प्रशंसा करना ।अन्य के अच्छे कार्य की यदि हम प्रशंसा करते है तो हमारे शुभ कर्मों का बंध होता है और अन्य के बुरे कार्य की प्रशंसा करते है तो हमें अशुभ कर्मों का बंध होता है ।
जैसे कि कोई आकर हमसे कहे की मैंने उसके साथ बेईमानी की, उसे पता भी नहीं चला और मुझे बड़ा फ़ायदा हो गया, ये बात सुनकर हमने उसकी तारीफ़ की , " वाह , तुम तो बड़े चालक हो , बहूत अच्छा काम किया तुमने।"
इस प्रकार उसकी प्रशंसा द्वारा उसके पाप के कार्य की अनुमोदना करके, हम भी उसके पाप में भागीदार बन गए ।यदि कोई अच्छे कार्य करता है , धर्म के कार्य करता है ,किसी की सेवा करता है , सहायता करता है और उसकी हम प्रशंसा करते है तो हम उसके अच्छे कार्य में भागीदार बनते है और हमें शुभ कर्मों का बंध होता है ।
इसलिए हमें अनुमोदना क्यों करनी , किसकी करनी, किसलिए करनी , इसकी जानकारी आवश्यक है ।बुरे कार्य की अनुमोदना नहीं करनी है और अच्छे कार्य की अनुमोदना किए बगर रहना नहीं है ।
श्रावक जब दो घड़ी की सामायिक करता है तब दो घड़ी के लिए सावध्य कार्यों का यानी की पाप कारी प्रवृतियों का त्याग करता है ।सामायिक में स्वयं पाप-कर्म करना नहीं और दूसरों से करवाना भी नहीं , परंतु पाप कर्म का अनुमोदन खुला रहता है , इसके पीछे का तात्पर्य ये है की श्रावक गृहस्थ भूमिका में है, वह सांसारिक प्रपंचों का पूर्ण त्यागी नहीं है , घर और दुकान आदि पर होने वाले पापारंभ के प्रति गृहस्थ का आंतरिक ममता रूप अनुमोदन चालू रहता है , अतः अनुमोदन का त्याग नहीं हो सकता ।श्रावक जब सामायिक में बैठता है, तब भी घर- परिवार की ममता का पूर्ण रूप से त्याग नहीं कर सकता है । श्रावक को अनुमोदन खुला रहता है इसका मतलब ये नहीं की
की सामयिक में वो हिंसा की प्रशंसा करे, झूठ का समर्थन करे, चोरी और व्यभिचार की घटना के लिए वाह-वाह करे,किसिको पीटते- मरते देखकर 'खूब अच्छा किया' एसा कहे, तो यह सामायिक नहीं, एक प्रकार का मिथ्याचार ही हो गया।
घर पर जो कुछ भी आरंभ- समारंभ होता रहता है , दुकान पर जो कुछ भी कारोबार चलता रहता है , सामायिक करते समय श्रावक प्रशंसा नहीं कर सकता, यदि वह एसा करता है तो वह सामायिक नहीं है , लेकिन जो वहाँ कि ममता का सूक्ष्म तार आत्मा के साथ बंधा रहता है , वह नहीं कट पाता ।इस अपेक्षा से अनुमोदन खुला है ।
साधु पूर्ण संयमी है , वह अपने जीवन में कोई भी पाप- व्यापार नहीं रखते है , अतः वे अनुमोदन का भी त्याग करते है ।अतः साधुत्व की भूमिका में ले जाने वाले- मन से अनुमोदू नहीं, वचन से अनुमोदू नहीं और काया से अनुमोदू। नहीं- उक्त तीन भंगो के सिवा शेष छह भंगो से ही अपने जीवन को पवित्र एवं मंगलमय बनाने के लिए संयम यात्रा
का आरंभ करता है ।यदि ये छह भंग भी सफलता के साथ जीवन में उतार लिए जाए, तो बेड़ा पार है|
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