Thursday, 21 May 2020

Abhyantar tap

आभ्यन्तर तप
वे तप जिनके बिना बाह्य तप निर्जरा करने में समर्थ नहीं है अथवा जिन तपों के द्वारा चिन्तन-मनन प्रशस्त, मन एकाग्र, शुद्ध व निर्मल होता है वे आभ्यन्तर तप हैं । ये भेद की दृष्टि से छः प्रकार के हैं जो निम्न हैं।

७. प्रायश्चित्त
व्युत्पत्ति की दृष्टि से प्रायः + चित्त, प्राय का अर्थ
अपराध और चित्त का तात्पर्य शोधन, संशोधन या प्रमार्जन है। प्रमादवश उत्पन्न
हुए दोषों के परिहार के लिए आलोचन, प्रतिक्रमण आदि चित्तशोधक क्रियाओं में
प्रायश्चित्त प्रवृत्त होना प्रायश्चित्त तप है।
मूलाचार के अनुसार पूर्वकाल में किये हुए पापों का विनाश करके जिसके
द्वारा आत्मा को निर्मल बनाया जाये वह प्रायश्चित्त तप है। मूलाचार में प्रायश्चित्त
के अन्यान्य आठ नामों (पर्यायवाची शब्दों) का उल्लेख मिलता है । जीतकल्पसूत्र
में उल्लेख है संवर और निर्जरा से मोक्ष होता है तथा संवर और निर्जरा का कारण
तप है। तपों में प्रायश्चित्त तप प्रधान है। प्रायश्चि्त के दस भेदों का भी
उल्लेख प्राप्त होता है।

८. विनय
ज्ञान, दर्शन, चारित्र व तपाचार की साधना में विशेष रूप से प्रवृत्त होना विनय तप है। वस्तुतः विनय शब्द 'वि' उपसर्गपूर्वक 'नी नयने'
धातु से बना है। 'विनयतीति विनयः' 'विनयति' के दो अर्थ होते हैं - दूर करना
और विशेष रूप से प्राप्त कराना। अत: जो अप्रशस्त कर्मों को दूर करती है और
विशेष रूप से स्वर्ग तथा मोक्ष को प्राप्ति कराती है वह विनय है। विनय का एक.अर्थ यह भी है - वरिष्ठ एवं गुरुजनों का सम्मान करते हुए उनकी आज्ञा में रत हो अनुशासित जीवना जीना।

 ९.वैयावृत्य
गुरु, शिक्षाशील, रोगी, गण, कुल, संघ, गच्छ, साधु तथा नवदीक्षित बालमुनि,
सेवा-शुश्रूषा करना अर्थात् आचार्य उपाध्याय, तपस्वी, वृद्ध-वय, तप आदि गुणों में वृद्ध मुनियों की सर्व सामर्थ्य से सेवा करना वैयावृत्य
तप है। स्थानांगसूत्र में आचार्य उपाध्याय , स्थविर, तपस्वी, ग्लान, शैक्ष, कुल, गण
संघ, साधर्मिक आदि पात्र के भेद से वैयावृत्य तप दस प्रकार का कहा गया है ।
मूलाचार तथा तत्त्वार्थवार्तिक में भी नाम संख्या के कुछ अन्तर से वैयावृत्य के दस
भेद प्राप्त होते हैं ।
 
१०.स्वाध्याय
स्वाध्याय शब्द दो रूप में परिभाषित किया जा सकता है प्रथम, स्व + आध्याय
स्व-आत्मा, अध्याय-अध्ययन अर्थात् आत्मा के
लिए हितकारक परमागम (शास्त्रों) का अध्ययन स्वाध्याय है । अपना
अध्ययन आत्मा का चिन्तन या मनन । द्वितीय, सु+आ +अध्याय अर्थात् सम्यक्
शास्त्रों का मर्यादापूर्वक अध्ययन करना। भगवतीसूत्र तथा तत्त्वार्थसूत्रादि में
वाचना, पृच्छना, परिवर्तना, अनुपेक्षा व धर्मकथा- ये पांच भेदों का उल्लेख प्राप्त
होता है तथा मूलाचार में भी नामभेद से पांच ही भेदों का वर्णन प्राप्त होता है ।

११. ध्यान - चित्तवृत्ति को एकाग्र करना ध्यान है। यह 'ध्यै चिन्तायाम् ' धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है चिन्तन। एक विषय में चिन्तन को स्थिर करना ध्यान है।ध्यान प्रशस्त और अप्रशस्त के भेद से दो प्रकार का है।
धर्मध्यान और शुक्लध्यान ये दो प्रशस्त ध्यान हैं तथा आर्त्त व रौद्र ध्यान ये दो
अप्रशस्त हैं। इन ध्यानों के भी अनेकानेक भेद-प्रभेद हैं जो स्थानांग, भगवती,
मूलाचार, तत्त्वार्थसूत्र, सर्वार्थसिद्धि, भगवती आराधना तथा विजयोदया टीका में
प्राप्त होते हैं।

१२. व्युत्सर्ग - त्याज्य वस्तु का त्याग व्युत्सर्ग तप है। यह आभ्यन्तर व बाह्य के रूप में दो प्रकार का है। उत्तराध्ययनसूत्र के अनुसार क्रोधादि रूप आभ्यन्तर और क्षेत्र, धन, धान्यादि रूप बाह्य परिग्रह का त्याग व्युत्सर्ग तप है।
मूलाचार में वि+उत्सर्ग, वि- विशिष्ट तथा उत्सर्ग का अर्थ त्याग। त्याग करने की
विशिष्ट विधि को व्युत्सर्ग कहते हैं । इस तरह निःसंगता ( अनासक्ति) निर्भयता
और जीवन की लालसा का त्याग ही व्युत्सर्ग है।
इस प्रकार उपर्युक्त बारह प्रकार के तप से युक्त साधक विधिपूर्वक अपने कर्मों का क्षयकर निर्ममत्व हो शरीर का व्युत्सर्ग या त्याग करते हैं वे अनुक्तर निर्वाण पद को प्राप्त होते हैं।

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