उपाध्याय श्री यशोविजयजी
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केवल 'उपाध्यायजी ' विशेषण बोलिए , और श्रीमद् यशोविजयजी उपाध्याय पहचाने जा सकते है । 'उपाध्यायजी का वचन है ' ऐसा कथन किसी भी शास्त्रीय विषय में अंतिम निर्णय माना जाता है । समकालीन मुनिवरों ने उनकी ' शास्त्रों के सर्वज्ञ ' एवं ' श्रुतकेवली ' के रुप में पहचान करवाई थी । जैन धर्म के परम प्रभावक , महान दार्शनिक , षड्दर्शन के जानकार और गुजरात के महान ज्योतिर्धर श्रीमद् यशोविजयजी उपाध्याय ने की हुई शासनसेवा एक दृष्टांतरुप माने जाते हैं । संस्कृत प्राकृत और गुजराती भाषा में एक सौ से भी अधिक ग्रंथों के रचयिता उपाध्यायश्री यशोविजयजी महाराज 'तत्वविशारद ' और ' कूर्चाल शारदा ' जैसे बिरुद प्राप्त कर चुके थे । आत्मोत्थान और शासनसेवा के प्रतीक स्वरुप अत्यंत गूढ़ , तात्विक एवं दार्शनिक ग्रंथों की रचना की ,और साथ ही संघ तथा समाजसेवा के लिए मुख्यतया सामान्य जनता की भाषा में याद रह जायँ ऐसे काव्यों का सर्जन किया ।
जैन संघ में अंतिम श्रुतकेवली श्री भद्रबाहुस्वामी की तरह उपाध्यायजी को ' अंतिम श्रुतपारगामी ' कहे जा सकते है । उनके बाद उनके जैसा आज तक श्रुतवेत्ता और शास्त्रप्रणेता समर्थ विद्वान अन्य कोई नही हुआ ।
उत्तर गुजरात के मेहसाणा से मोढ़ेरा जाते हुए मार्ग में आये छोटे से कनोड़ा गाँव में उनका जन्म हुआ था । उनके पिता का नाम नारायण और माता का नाम सौभाग्यदेवी था । सौभाग्यदेवी की धर्म में अटल श्रद्धा थी , अतः ' भक्तामर स्तोत्र ' का स्मरण करके ही प्रतिदिन अन्नजल ग्रहण करने का नियम था , किन्तु एक बार मूसलाधार वर्षा के कारण सौभाग्यदेवी तीन दिन तक उपाश्रय मे साध्वीजी महाराज के पास ' भक्तामर स्तोत्र ' सुनने न जा सकीं , फलतः उन्हें अन्नजल के बिना रहना पड़ा । यह कारण ज्ञात होते ही बालक जशवंत ने कहा ,
" माँ ! तुम्हारे साथ उपाश्रय में आता था और तुम्हारे पास बैठकर यह स्तोत्र सुनता था , अतः मुझे वह स्तोत्र अच्छी तरह याद हो गया है । "
चार -पाँच वर्ष के बालक ने एक भी गलती के बिना फर्राटे से " श्री भक्तामर स्तोत्र " का संपूर्ण पाठ किया । माँ का दुलारा जशवंत सारे गाँव का प्यारा हो गया । इसी प्रकार एक बार जशवंत ने साधु महाराज के साथ प्रतिक्रमण किया और एक ही बार सुने हुए तमाम सूत्र कंठस्थ हो गये । धर्मपरायण माता-पिता ने कुलदीपक को शासन-सेवा में समर्पित किया ।
अहमदाबाद के सूबेदार महोबतखान को अठारह अवधान का प्रयोग बताते ही सूबेदार उनकी प्रतिभा से प्रभावित हो गया । श्री यशोविजयजी की प्रतिभा निरंतर विकसित होती रही और फैलती रही । श्री यशोविजयजी के गुरु महाराज पूज्य नयविजयजी भी शिष्य की ज्ञान-आराधना से प्रसन्न थे । उन्होंने सोचा कि यदि इस तेजस्वी साधु को काशी के विद्वान पंडितों के पास भेजा जाय ,तो उनकी तेजस्विता पूर्ण रुप से प्रकटित हो सकती है । जब धनसूरा नामक श्रावक ने गुरु महाराज से बिनती की कि आप उन्हें काशी में ज्ञानोपार्जन की अनुमति दें , तो उनके लिए काशी में सब सुविधा अर्जित करने का लाभ मुझे दीजिए । काशी में गंगा किनारे श्रुतअधिष्ठात्री सरस्वती का वरदान प्राप्त किया । यहीं न्याय अभ्यास करके विद्वता प्रदर्शित करनेवाले श्रीयशोविजयजी को स्वयं अजैन विद्वानों ने ' न्यायाचार्य ' और ' न्यायविशारद ' जैसे बिरुद दिये । काशी को दुर्जेय विद्वानों की सभा में पाँच सौ पंडितों को अकेले ही जीत कर उन्होंने ' न्यायाचार्य ' का बिरुद प्राप्त किया ।
विक्रम संवत् 1743 में डभोई की पुण्यभूमि पर उपाध्यायजी महाराज का अंतिम चातुर्मास था । पचपन वर्ष के सुदीर्घ संयमी जीवन के बाद अंत में समाधिपूर्वक कालधर्म हुआ । उपाध्यायजी महाराज के ग्रंथ अर्थात चिरस्थायी और निरंतर प्रकाशमान जिनशासन के चमकते अनमोल रतन ! संस्कृत , प्राकृत और गुजराती भाषा में न्याय , व्याकरण ,योग और अध्यात्म के रचयिता उपाध्यायश्री यशोविजयजी को ' लघुहरिभद्र ' अथवा ' द्वितीय हेमचंद्राचार्य ' कहा जाता है । समृद्ध और वैविध्यपूर्ण साहित्य-सर्जन के कारण जिनशासन में अंतिम श्रुतकेवली श्री भद्रबाहुस्वामी की तरह उपाध्याय यशोविजयजी ' अंतिम श्रुतपारगी ' कहे जा सकते है ।
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साभार: जिनशासन की कीर्तिगाथा
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