विहरमान प्रभु की संख्या,
समझकर कुछ याद रखने जैसी बातें।
1 - विहरमान का अर्थ है वर्तमान में मध्यलोक में विचरण कर रहे तीर्थंकर प्रभु,
2 - मध्यलोक में तीर्थंकर सिर्फ अढाई द्वीप की 15 कर्मभुमी क्षेत्र में ही उत्पन्न होते है।
3 - अढाई द्वीप में 15 कर्मभुमी =
एक जंबुद्वीप - 1 भरत, 1 ऐरावत 1 महाविदेह
दूसरा घातकीखण्ड (पूर्व भाग व पश्चिम भाग ) - 2 भरत, 2 ऐरावत , 2 महाविदेह
आधा पुष्कर द्वीप ( पूर्व- पश्चिम )- 2 भरत, 2 ऐरावत , 2 महाविदेह
4 - सभी भरत ऐरावत में तीसरे चौथे आरे में ही तीर्थंकर प्रभु होते है। 1, 2 , 5, 6 थे आरे में कोई तीर्थंकर नही होते। वर्तमान में यहां अवसर्पिनी का पांचवा आरा चल रहा है सो कोई प्रभु नही।
5 - महाविदेह में समय एक जैसा होता है। हमेशा प्रभु जी होते ही रहते है। एक महाविदेह में 32 विजय है, ज्यादा से ज्यादा 1 विजय में 1 पभु हो सकते है।
6 - एक महाविदेह की 32 विजय में कभी भी कम से कम 4 विजय में तीर्थंकर प्रभु होंगे ही होंगे। (ज्यादा से ज्यादा हो तो एक महाविदेह में 32 )
7 - ऐसे सभी 5 महाविदेह की 32 × 5 =160 कुल विजय है। तो कम से कम 20 तीर्थंकर ओर ज्यादा से ज्यादा 160 तीर्थंकर हो सकते है।
8 - विहरमान के केवली, साधुजी आदि की संख्या गिनते समय यह याद रक्खे। जैसे एक विहरमान के 100 क्रोडी मुनि तो 20 विहरमान के 2000 क्रोडी मुनि।
9 - अभी जो 20 विहरमान है उनकी सभी लाक्षणिकता समान है जैसे500 धनुष ऊंचाई, 84 लाख पूर्व की आयु, उनका परिवार आदि ।
उनका जन्म, दीक्षा, केवल्यप्राप्ति आदि भी एक साथ ही हुआ।
10 - जंबुद्वीप में सीमंधर स्वामी, युगमन्धर स्वामी, बाहुस्वामी, सुबाहुस्वामी ये 4 प्रभुजी विहरमान है।
11 - ऐसे ही एक महाविदेह की 32 विजय में किसी भी समय 4 चक्रवर्ती, 4 बलदेव वासुदेव होंगे ही होंगे।
12 - जिस विजय में बलदेव वासुदेव है , वँहा प्रभुजी हो सकते है पर चक्रवर्ती नही हो सकते। ऐसे ही चक्रवर्ती के समय तीर्थंकर हो सकते है। पर बलदेव वासुदेव नही। यह अवश्य याद रक्खे।
जिनवाणी विपरीत अंशमात्र लिखने में आया हो तो मिच्छामि दुक्कडम।
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