Saturday, 9 May 2020

Falvriddhi parshwanath merta hist9

श्री फलवृद्धि पार्श्वनाथ तीर्थ - संक्षिप्त इतिहास

फलवृद्धि, फलोदी और वर्तमान में मेड़तारोड़ कहलाने वाला गाँव अत्यन्त प्राचीन है । ''ओसवाल जाति" की ऐतिहासिकता से ज्ञात होता है कि किसी समय मेड़तारोड़ फलोदी में कर्इ पाँच हजार घर ओसवालों के थे।

प्राचीन तीर्थ कापरड़ा जी का इतिहास ले. मुनि श्री ज्ञानसुन्दर जी महाराज ने पृ.सं. 09 पर लिखा है कि - 'वि. सं. 1181 में आचार्य धर्मघोष सूरि 500 मुनियों सहित फलवृद्धि चतुर्मास रहे थे। इससे स्पष्ट होता है कि उस काल में जैन समाज का वाहुल्य था और यह बहुत समृद्धषाली शहर था । ''मारवाड़ रा परगनां री विगत भाग-3" से पता लगता है कि श्री फलोदी माता का मन्दिर मूलत: राजा मानधाता का बनवाया हुआ है । इसी राजा ने करीबन दो हजार वर्ष पहले मेड़ता नगर को बसाया था । उस समय यह मानधातृपुर कहलाता था । यह तथ्य मेड़तारोड़ की प्राचीनता की पुष्टि करता है । 

रेल्वे स्टेशन से दो सौ मीटर दूर पषिचम दिषा में ''फलवृद्धि पार्श्वनाथ" का भव्य एवं विशाल मन्दिर है, जो ''फलवृद्धि पार्श्वनाथ" तीर्थ के नाम से सुविख्यात है। 

चौदहवीं शताब्दी में श्री जिनप्रभ सूरीष्वरजी द्वारा रचित ''विविध तीर्थ कल्प पृ.सं. 105-106 पर इसका विस्तृत वर्णन है । इसके अध्ययन से मालूम होता है कि यहाँ गोपालक श्री धाँधल श्रेष्ठी की एक गाय दूध नहीें देती थी । गायों को चरवाने वाले चरवाहे द्वारा इस बात का पता लगवाने पर ज्ञात हुआ कि एक टीबे के पास पेड़ के नीचे गाय के स्तनों से स्वत: ही दूध हमेषा झर जाता है। इस वृतान्त से उसने सेठ को अवगत करवाया। यह सुनकर वह सतंभित रह गया ''तीर्थ दर्शन द्वितीय खंड" से ज्ञात होता है की - 'सेठ को स्वप्र में अधिश्ठायक देव ने बताया कि जहाँ दूध झरता है, वहाँ देवाधिदेवत श्री पार्श्वनाथ प्रभु की सप्तफणी प्रतिमा है । प्रयत्न करने पर वहाँ से प्रकट होगी, जिसे मन्दिर का निर्माण करवाकर प्रतिश्ठत करवाना है । 

धाँधल सेठ ने यह वृतान्त अपने र्इश्टमित्र श्री शिवशंकर से कहा । दोनो मित्र अत्यन्त प्रसन्न हुए । स्वप्रानुसार यह भव्य चमत्कारिक प्रतिमा प्राप्त हुर्इ । यह देखकर उन्हे आशतीत हर्ष एवं परमानन्द की अनुभूति हुई । प्राचीन तीर्थ श्री कापरड़ाजी का इतिहास से मालूम होता है कि - ''पार्श्वनाथ भगवान की मूर्ति वेलू रेती और गौदूग्ध मिश्रित बनी है।" 

सम्भवतया कुछ दिनों तक दोनो मित्र प्रसन्नता पूर्वक मूर्ति की विधिवत पूजा-अर्चना करते रहे, फिर शुभ मुहर्त अतयन्त उत्साह के साथ मन्दिर निर्माण का कार्य प्रारम्भ कर दिया और अग्र मण्डप बनकर तैयार हो गया परन्तु अर्थाभावश कार्य बीच में ही रूक गया, इससे दोनों मित्र दु:खी रहने लगे।  उनके अन्तर की पीड़ा को जानकर अधिष्ठायक देव फिर स्वप्र में प्रकट हुए।

तीर्थ-दर्शन द्वितीय खण्ड से ज्ञात होता है कि उन्होंने कहा कि -''हमेषा प्रात: प्रभु के सम्मुख स्वर्ण मुद्राओं से स्वसितक किया हुआ मिलेगा," उससे कार्य पूर्ति कर लेना लेकिन यह बात किसी को मालूम नहीं पड़ने देना। पुन: मन्दिर निर्माण का कार्य प्रारम्भ हुआ। पाँच मण्डप भी बनकर तैयार हो गये । एक दिन सेठ के लड़के ने यह अनोखा दृश्य छिपकर देख लिया। उस दिन से स्वर्ण मुद्राएँ मिलनी बन्द हो गयी, जिससे मन्दिर कुछ अपूर्ण अवस्था में रह गया।

वि.सं. 1181 में जब आचार्य श्री धर्मघोष सूरीष्वर जी पधारे तब श्री संघ को उपदेश देकर कार्य को पूर्ण करवाकर प्रतिश्ठा करवायी । इसी घटना को विद्वानों एंव इतिहास प्रमियों ने लेखन के कौशल को प्रस्तुत करते हुए अपने-अपने ढगं से लिखा है ।

मन्दिर के प्रथम खण्ड में पद्वासन मुद्रा में फलवृद्धि पार्श्वनाथ की सप्तफणी ष्याममूर्ति है जो लगभग 105 से.मी. की है । मूर्ति का आकर्षण एवं सौन्दर्य अलौकिक है जिसको निर्निमेष नयनों से निहारते-निहारते दर्शक उसी सौन्दर्य में डूब कर दिव्यानन्द की अनुभूति करते हैं, जो अवर्णित है ।

दूसरे खण्ड में बायी ओर चन्दाप्रभु जी, महावीर जी व पारसनाथ जी की मूर्तियाँ तो वायी ओर शीतलनाथजी, पार्श्वनाथ जी व अरनाथजी की मनामोहक मूर्तियाँ हैं।

इसके बाद मुख्य दरवाजा है, जिसकी दीवारों के ताको में एक ओर भैरव तो दूसरी ओर पारस यक्ष की मूर्तियाँ रखी हुई है , जिसके नीचे हाथी दर्षाए गये हैं । इसके ऊपर छोटा गुम्बज है । 

चौथा खण्ड बहुत ही बड़ा है, जिसके उपर बने विषाल गुम्बज के कृश्ण लीला अंकित है । पाँचवें खण्ड में समेतशिखरजी महातीर्थ का पटट बायी ओर नन्दीश्वर द्वीप का पटट गिरिनारजी महातीर्थ तथा मणिभद्र व चकेष्वरी देवी की मूर्तियाँ है । इसके बायी ओर शत्रुंजय महातीर्थ, अष्टापदजी का पटट सिद्धिचक्र, महामंत्र के पटट हैं तथा पद्वावती व अधिष्टायक देव की मूर्तियाँ हैं । 

''श्री फलवृद्धि पार्श्वनाथ कल्प जो संवत 1389 में श्री जिनप्रभसूरिजी महाराज सा. ने लिखा है कि चैत्य में धरणेन्द्र, पदावती क्षेत्र अधिश्टायक देव विधनों को दूर करते है और नमस्कार करने वाले भक्तों को मनोरथ पूरा करते है । यहाँ जो भविक जन समाधि पूर्वक अहो रात्रि रहते है वे हाथ में स्थिर दीपक धारण किया हुआ चलते फिरते व्यक्ति की आकृति दृष्टिगोचर होती है।

मन्दिर के परिक्रमा परिसर में पार्श्वनाथ भगवान के दस भवों के 13 चित्रपट तथा महावीर स्वामी के 27 भवों के 9 पटट हैं । इसके मध्य में फलवृद्धि तीर्थ का इतिहास अंकित है, जिसके पीछे संगमरमर पत्थर की छोटी चरण पादुकाएँ हैं । इतिहास के नीचे लिखा हुआ है-'' श्री परमपूज्य आचार्य श्री धर्मघोष सूरीवष्वर जी महाराज की चरण पादुका । इसकी प्रतिष्ठा संवत 1625 फागुण सुदि 10 गुरूवार को हुयी थी इस के साथ च्यवन कल्याणक, मेरू शिखर पर्वत, दीक्षा कल्याणक, कैवल्य ज्ञान कल्याणक तथा निर्वाण कल्याणक पटट हैं । इन सभी पटटों पर जिसकी तरफ से बनाएँ गए हैं, उन सभ महानुभावों के नाम लिखे हुए हैं।

मन्दिर के बाहर व भीतर का सारा काम संगमरमर पत्थर का है । यहाँ की भव्यता यात्रियों को प्रभावित किये बगैर नहीं रहती । इस प्रकार मन्दिर की संक्षिप्त जानकारी अंकित की हुयी है ।

जोधपुर राज्य का इतिहास, प्रथम-खण्ड केलेखक गौरीशकर हीराचन्द ओझा पृ.सं. 37 से ज्ञात होता है कि ''मन्दिर के सामने दोनों तरफ एक-एक संगमरमर की शिला लगी है, जिस पर लेख खुदे हैं । एक लेख वि.सं. 1221 मार्गषीर्श सुदि 6 (र्इ.सं. 1164 ता. 21 नवम्बर) का है, जिसमें पार्श्वनाथ के मन्दिर के लिए पोरवाड़ रूपमुनि एवं भंडारी दसाढ़ा आदि की दी हुर्इ भेटों का उल्लेख है । दुसरे लेख में संवत नहीं है । इसमें सेठ मुनिचन्द्र - द्वारा उत्तानपटट बनाये जाने का उल्लेख है ।

प्रतिश्ठा-लेख-संग्रह: में इस संदर्भ के षिखालेख स्पश्ट है ऊँ संवत 1221 मार्गसिर सुदि 6 श्री फलवद्विकायां देवाधिदेव श्री पार्श्वनाथ चैत्ये श्री प्राग्वाट वंषीय श्रे. पिमुणि भं. द्रसाढाभ्यो आत्मा श्रेयोर्थ श्री चित्रकूटीय सिलफट-सहित चन्द्रको प्रदत्त : षुभंभवत ।।

'नागौर का राजनीतिक एवं सांस्क1तिक इतिहास से ज्ञात होता है कि - र्इसा की बारहवीं शताब्दी से पहले यहाँ महावीर जिनालय था । इस्वी सन 1124 में धर्मघोश सूरि को यहाँ से पार्श्वनाथ की मूर्ति प्राप्त हुयी थी इस्वी सन 1147 में पार्श्वनाथ जिनालय का निर्माण करवाया । दसके उदघाटन समाराहे में अजमेर तथा नागौर से धार्मिक श्रद्धालु आये ।

इस तीर्थ के बारे में अनेक स्तवन व स्त्रोत मिले हैं जो इस के ऐतिहासिक पृष्ठो की महत्ता को उजागर करते है । *श्री जिनप्रभसुरि रचित श्री फलवृद्धि कल्प में लिखा है कि 68 तीर्थो की यात्रा करने से जो फल मिलता है वह फलवृद्धि पार्श्वनाथ की यात्रा करने से प्राप्त होता है।* इससे ज्ञात होता है कि यह प्राचीन तीर्थ अपने कण-कण में दिव्य ज्ञान चिरकाल से समेटे हुए है । जिसको स्पर्श कर अनेकानेक आत्माए मद पार हो गई हैं ।

मध्यकालीन नागौर का इतिहास से ज्ञात होता है कि फलोदी पार्श्वनाथ (मेड़तारोड़) का मन्दिर इस क्षेत्र का बहुत ही प्रसिद्ध जिनालय था, जिसके शिखर की प्रतिष्ठा वि.सं. 1181 (1124 इस्वी सन) मे श्री धर्मघोषसूरि ने की थी और इसका जीर्णोद्धार वि.सं. 1234 (1137 .इस्वी सन ) में जिनपति सूरि द्वारा हुआ था यहाँ की मूल नायक प्रतिमा की लगभग वि.सं. 1235 (1178 र्इ.) में शहाबुद्विन मोहम्म्द ने भंग किया था । आबूरास में राजस्थान के कवि आसिगु रचित जीवदया रास संवत 1257 के आसोज सुदी 7 को सहजिगपुर के पार्श्वनाथ मन्दिर में रचा 

*मार्गदर्शन* : यहां से नजदीक का स्टेशन मेड़ता रोड जंक्शन 1-4 कि.मी. दूर है। स्टेशन पर सवारी का साधन उपलब्ध है। मेड़ता सिटी यहां से लगभग 15 कि.मी. दूर है। जोधपुर, मेड़ता सिटी व नागौर से सीधी बसें मिलती है। मंदिर तक पक्की सड़क है, कार व बस आखिर तक जा सकती है। यहां के लिए दिल्ली, जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, पंजाब, जम्मू, मुंबई, अहमदाबाद व कलकत्ता से रेल व्यवस्था है।

सुविधाएं : ठहरने के लिए मंदिर के अहाते में ही सर्व सुविधायुक्त विशाल धर्मशाला है, जहां पर भोजनशाला सहित सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं।

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